Thursday, September 25, 2008

वेलकम टू हिन्दी

पिछ्ले कुछ दिनों से ये एहसास हुआ की ज़रूरत पड़ने पर हिन्दी भाषा के उचित शब्द दिमाग में नहीं आते। थोड़ा दुःख भी हुआ और शर्म भी आयी। खैर ज्यादा कुछ किया नहीं जा सकता, आप उसी भाषा का प्रयोग ज्यादा करते हैं जो की आपके आसपास के लोग प्रयोग करते हों और जो लिखबे में आसान हो। याद आती हैं हमें अपनी दसवीं की क्लास जब हम टीचर के नोट्स अंग्रेज़ी में लिखा करते थे। बड़ा मज़ा आता था दोस्तों को समझ में नहीं आता थे के ये ऐसा क्यूँ करता है, अब लिखना आसान हो जाता था और थोड़ा भाव भी बढ़ता था।

हाल फिलहाल में हमने देखा "वेलकम टू सज्जनपुर"। फिल्म तो वाकई तारीफ के लायक है और हमारे लिए तो बहुत ही। पुरानी यादें ताज़ा हो गई। फ़िल्म की कहानी सज्जनपुर नाम के गाँव की है। ये कोई काल्पनिक गाँव नहीं है, वाकई में हैं। इलाहाबाद और जबलपुर के बीच में। बहुत ही वास्तविक बनाई है - भाषा की बात करें या पहनावे की , एक्टिंग की बात करें या जगह की, सब कुछ बहुत ही ग्रामीण परिवेश में नज़र आता है। फ़िल्म में काफी बातों का समावेश है रीतियाँ, कुरीतियाँ, हसी, दुःख, जलन, सभी कुछ। सभी किरदार बड़े सटीक बैठे हैं। सीधे साधे लोग, चालाक और धूर्त लोग। सज्जनपुर ऐसा गाँव है जो कि उन्नति की और धकेला जा रहा है अस्पताल है, रोड है झाड़ के घर भी हैं और पक्का मकान भी है, पोस्ट ऑफिस भी है और यहीं से जुड़ी है नायक के ज़िन्दगी। वोह लोगों के लिए चिट्ठी लिखता है, समस भी लिखता है, सबका दाम निश्चित है। कुछ लोग पैसा देते हैं तो कभी कभी जडीबूटी भी मिलती हैं ..... (आपको हसीं जरूर आएगी इस सीन में)। अंत में कुनाल कपूर भी देखने को मिलते हैं

ये बात तो हुई पिक्चर की। लाइफ में सब कुछ ठीक ठाक ही है. कई दोस्तों की शादी हो चुकी है अपनी कोई गर्ल फ्रेंड भी नहीं.... :)। अभी एक मित्र ने बहुत गाली दी, हम अपने बचाओ में कुछ कह भी नहीं पाये। खैर लाइफ चल रही है।

2 comments:

Anonymous said...

mitra sahi hai, hindi mubarak ho..

Alok

Akhand said...

dhanyawaad